Friday, 11 February 2022

सीमेंट की ईंट बनाने का करें बिजनेस, लाखों कमाएं

सीमेंट की ईंट बनाने का करें बिजनेस, लाखों कमाएं

   सीमेंट की ईंट बनाने का बिजनेस (Fly Ash Bricks Business)... सीमेंट की ईंट बनाने का बिजनेस मुनाफे का business है! इसकी शुरुआत करने के लिए सरकार से मदद भी मिल जाएगा। अगर आपके पास थोड़ा बहुत खाली जमीन का कोई टुकड़ा यानी प्लॉट है, तब यह बिजनेस शुरू किया जा सकता है।


   Investment & Profit in Fly Ash Bricks Business:
इसके लिए 100 गज जमीन और कम से कम 2 लाख रुपये का निवेश करना होगा। इस पर आप हर महीने एक लाख रुपये तक की कमाई आसानी से कर सकते हैं।

   फ्लाई एश ब्रिक को आम तौर पर सीमेंट की ईंट भी कहा जाता है। इस बिजनेस को शुरू करने के लिए सरकार भी मुद्रा योजना (Mudra Scheme) के तहत आपकी मदद भी हो जाएगी।

   आजकल घर और बिल्डिंग बनाने के लिए लाल ईंट की जगह थर्मल पावर प्लांट की कोयले की राख (Fly Ash) से बनी ईंटें इस्तेमाल की जाने लगी हैं। इन ईंटों का चलन छोटे कस्बों और गांव में भी शुरू हो गया है।

   इस बिजनेस के लिए निवेश का ज्यादातर हिस्सा मशीनरी में लगेगा। इस मशीन के जरिए ईंट बनाने के लिए कम से कम 5-6 लोगों की जरूरत पड़ती है। इससे हर दिन करीब 3,000 ईंट बनाए जा सकते हैं। इस निवेश में कच्चे माल की लागत शामिल नहीं की गई है। अगर आप ऑटोमेटिक मशीनों का इस्तेमाल करते हैं तो लागत थोड़ा बढ़ जाएगी। लेकिन इससे कमाई के मौके भी बढेंगे।

Wednesday, 10 March 2021

अनुपम रसायन: निवेश के लिए अच्छा आईपीओ

     गुजरात के सूरत में स्थित अपनी छ: ईकाइयों में कृषि, औषधि और पर्सनल उपयोग में आने वाले खास तरह के केमिकल का उत्पादन करने वाली अनुपम रसायन इंडिया लि. 12 मार्च को पूंजी बाजार में आ रही है। अनुपम 553-555 रु मूल्य पर बोली (बिड) के आधार पर शेयरों की बिक्री के जरिए 760 करोड़ रु जुटाने का लक्ष्य लेकर चल रही है।

     

    1984 में एक साझा फर्म के रूप में सूरत में स्थापना की गई थी। आनंद देसाई, डा.किरन सी पटेल, मोना ए देसाई प्रमुख प्रमोटर हैं। दो फर्मों आर आई आर सी पी एल और के पी आई एल एल सी को अनुपम में हिस्सेदारी देकर शेयरधारक बना लिया था। कंपनी ने छोटे स्तर पर कारोबार शुरू किया था लेकिन धीरे-धीरे विस्तार करती गई।

    वर्तमान में इसकी छ: उत्पादन ईकाइयां हैं, इनमें से चार ईकाइयां साचिन में और दो फैक्ट्री झागड़िया में स्थित हैं। इनकी कुल स्थापित क्षमता सालाना 23438 टन की है। अनुपम 36 तरह के रसायनों का उत्पादन अपनी ईकाइयों में करती है। इन रसायनों को देशी बाजार के अलावा यूरोप, जापान व अमेरिका सहित कई देशों को निर्यात भी किया जाता है। निर्यात मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन करने के एवज में अनुपम को निर्यात घराना का दर्जा प्राप्त है।

     अनुपम रसायन ने 2018-19 में 521 करोड़ रु की आय पर 49करोड़ रु का कर बाद लाभ दर्ज किया था। जबकि 2019-20 में 539 करोड़ रु की आय हुई और 53 करोड़ रु करबाद लाभ। चालू वित्तीय वर्ष 2020-21 की पहली छमाही में आय 374 करोड़ रु और कर बाद लाभ 26.48 करोड़ रु रहा। आने वाले आईपीओ के माध्यम से कुल 760 करोड़ रु जुटाने की योजना है, इसमें से 556 करोड़ रु बकाया कर्ज के भुगतान में चला जाएगा। शेष 204 करोड़ रु कार्पोरेट की अन्य मदों पर खर्च होगा।

     कंपनी पर लगभग 300 करोड़ रु के विदेशी मुद्रा ऋण व बकाया ब्याज सहित 814 करोड़ रु से अधिक कर्ज है। अटपटी बात यह है कि कंपनी की एक महिला प्रमोटर ने अमेरिका के डेलावयर में संयुक्त रूप से 'के पी आई एल एल सी की भी प्रमोटर हैं, के पी आई ने ही अनुपम रसायन को ब्याज पर 3.5 करोड़ डाॅलर (करीब 250 करोड़ रु) का कर्ज दे रखा है।

     जाहिर है कि महिला प्रमोटर को ब्याज भी मिलता होगा। अनुपम के एक अन्य प्रमोटर और प्रबंध निदेशक आनंद देसाई आर आई आर सी पी एल के भी प्रमोटर हैं। आर आई आर सी पी एल अनुपम की प्रमोटर भी है। एक प्रमोटर द्वारा अनुपम को कर्ज और उससे ब्याज की कमाई और प्रबंध निदेशक की क्रास होल्डिंग का उद्देश्य क्या है ? कंपनी अपने शेयरों को बीएसई और एनएसई में लिस्ट कराएगी। छोटे निवेशक न्यूनतम 27 शेयरों के लिए 14985 रु के भुगतान के साथ बोली में ‌भाग लेने के लिए 16 मार्च तक एप्लाई कर सकेंगे।

     प्रणतेश नारायण बाजपेयी

Monday, 8 March 2021

यूके के लिबॅर की विदाई, भारतीय बेंचमार्क का बन रहा रोडमैप

     भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा विनिमय दर और ब्याज दर के निर्धारण का पूर्ण स्वदेशी आधार अर्थात एक स्वतंत्र बेंचमार्क (संदर्भिका) को कुछ ही महीनों में लांच करने की तैयारी में इन दिनों पूरी जोरदारी से जुटा है। लिबॅर के स्थान पर भारतीय बेंचमार्क को वित्तीय बाजार में सुगमतापूर्वक स्थापित करने के लिए वित्तीय स्थिरता और विकास परिषद (एफएसडीसी) के कहने पर वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलात विभाग के तत्वावधान में गठित अंतर्विषयक समिति ने ट्रांज़ीशन रोडमैप बनाने का काम शुरू कर दिया है।

 

  तकरीबन पांच दशकों से अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाजार पर एकछत्र राज करने वाले लिबॅर (लंदन इंटर बैंक आॅफर्ड रेट) को हर हाल में 2021 के समाप्त होने तक हमेशा के लिए गुडबाई कर ली जाएगी। लिबॅर पर से विश्वास उठने और इस पर निर्भरता खत्म करने के पीछे भी निजी स्वार्थों भरी एक दिलचस्प कहानी है। यूनाइटेड किंगडम (यूके) का लिबॅर एक ऐसा महत्वपूर्ण बेंचमार्क (संदर्भिका) रहा है। जिसे यूके ही नहीं बल्कि अधिकांश देशों के बैंक और वित्तीय संस्थानों से लेकर वित्तीय बाजार नियामक तक इसकी घोषित दरों के आधार पर अपनी दरें तय करते हैं।

    2009-10 से बड़े स्तर पर हेरा फेरी (फर्जी आकड़े पेश करके) करके लिबॅर दरों में घट-बढ़ करके मुट्ठी भर बैंकरों के साथ कुछ और लोग कमाई करने का खेल चला रहे थे। निजी स्वार्थों में टकराव होने पर इस खेल की पोल खुली वर्ष 2012 में। यूरोप के कई नामी, अंतर्राष्ट्रीय स्तर के भारी भरकम बैंक, वित्तीय संस्थान हेराफेरी में संलिप्त थे।

      दुनिया में यह लिबॅर स्कैंडल नाम से जाना गया। वैश्विक गुडविल रखने वाले ड्योश बैंक, सिटी ग्रुप, राॅयल बैंक आॅफ स्काॅटलैंड, बारक्लेज़, जेपी माॅर्गन चेज़ सालों तक अंतर्राष्ट्रीय आलोचना के केंद्र रहे, एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तक ही नहीं सीमित रहे ये, मुकदमे भी चले। इन सबकी सज़ा असहाय लिबॅर को भुगतने पड़ रही है और अब तो उसे सूली पर चढ़ाने की अंतिम तारीख 2021, 31 दिसंबर भी तय की जा चुकी है।

      लिबॅर पर दशकों से कायम विश्वास को स्कैंडल ने एक झटके में ढहा दिया। लिबर स्कैंडल से अन्य देशों की तरह भारतीय नियामक और नीति निर्धारकों ने सबक लेते हुए स्वदेशी संदर्भिकाएं अर्थात बेंचमार्क विकसित करने का आंतरिक निर्णय किया। जिसके अंतर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक ने वर्ष 2014 में विजय भास्कर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समिति की अनुसंशाओं के आधार पर ही संदर्भिकाएं विकसित करने और इनको प्रशासित करने को 2014 दिसंबर में कंपनी अधिनियम के तहत अपने नियामकीय तत्वावधान में (स्वामित्व में नहीं) भारतीय रिज़र्व बैंक ने फाइनेंशियल बेंचमार्क्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (एफबीआईएल) स्थापित कराई।

     एफबीआईएल में इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) 10 फीसद की, फाॅरेन एक्सचेंज डीलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एफईडीएआई) 14 फीसद की और फिक्स्ड इनकम मनी मार्केट ऐंड डेरिवेटिव्स एसोसिएशन (एफआईएमएमडीए) 76 फीसद की हिस्सेदार है। वाणिज्यिक बैंकों ने मिलकर 1958 में एफईडीएआई स्थापित की थी, यह स्वनियंत्रित संस्था है। एफआईएमएमडीए को 1998 मई में अनुसूचित बैंकों, सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों, प्राइमरी डीलर्स और बीमा कंपनियों ने मिलकर स्थापित किया था।

      एफबीआईएल इन दिनों लिबॅर का देशी विकल्प तैयार करने में पूरी तरह से जुटी हुई है। लिबॅर के स्थान पर देशी बेंचमार्क को अपनाने तक का 'संक्रांति काल' अर्थात ट्रांज़ीशन पीरियड अत्यंत नाजुक माना जाता है, संक्रांति काल में बिना किसी बाधा के नव सृजित देशी बेंचमार्क को स्थापित कराने के लिए 'ट्रांज़ीशन रोडमैप' पर तेजी से कार्य किया जा रहा है। आने वाली जून-सितंबर तिमाही तक मार्केट रेपो ओवरनाइट रेट (एमआरओआर), सर्टिफिकेट आॅफ डिपाॅज़िट (सीडी) और ट्रेज़री बिल्स (टी-बिल), ओवरनाइट मुंबई इंटरबैंक आउटराइट रेट (एमआईबीओआर) का प्रशासन एफबीआईएल के सुपुर्द कर देने की संभावना है।

    प्रणतेश नारायण बाजपेयी

जानिए, बदल जाएंगे 1 अप्रैल से लेनदेन के नियम

     भारतीय रिजर्व बैंक ने 50 करोड़ रु और इससे अधिक धनराशि को भेजने वाले और प्राप्त करने वाले ग्राहकों के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली 'लीगल एंटिटी आइडेंटिफायर' (एलईआई) कोड अगले माह 1 अप्रैल 2021 से अनिवार्य कर दिया है। रियल टाइम ग्राॅस सेटलमेंट (आरटीजीएस) और नेशनल इलेक्ट्राॅनिक फंड ट्रांसफर (नेफ्ट) प्लेटफाॅर्म से उक्त मात्रा में धनराशि के लेनदेन का रिकाॅर्ड रखने का निर्देश भी रिज़र्व बैंक जारी कर चुका है।

    बीस (20) अंकों वाले एलईआई कोड को अपनाने से लेनदेन करने वाले 'कौन, क्या, कहां से हैं' यानि कि उनका पता-ठिकाना, पहचान उजागर हो जाती है। ये पारदर्शिता समग्र वित्तीय बाजार के लिए दिन पर दिन अति महत्व की होती जा रही है। वर्ष 2007-08 में 'लेहमन संकट' के वैश्विक दुष्प्रभाव भोगने केबाद 'जी-20' समूह के सदस्य देशों की सरकारों तथा नियामकों ने एकजुट होकर गहन मंथन किया और जोखिम प्रबंधन के तहत वित्तीय लेनदेन प्रक्रिया को अधिकतम पारदर्शी बनाने की जरूरत महसूस की गई।

    इसी रणनीति के अंतर्गत 'जी-20 समूह' ने 2014, जून में गैर लाभ संस्था 'ग्लोबल लीगल एंटिटी आइडेंटिफायर फाउंडेशन (जीएलईआई एफ) की स्थापना की। इसी फाउंडेशन के बैनर तले इस प्रणाली को 'लीगल एंटिटी आइडेंटिफायर (एलईआई)' नाम दिया गया। फाउंडेशन का निदेशक बोर्ड विभिन्न देशों में एलईआई कोड नंबर देने वाली मान्यताप्राप्त (जीएलईआईएफ से) क्षेत्रीय इकाइयों को नियंत्रित करता है।

     भारत में एलईआई कोड नं. जारी करने के लिए 'लीगल एंटिटी आइडेंटिफायर इंडिया लि. (यह कंपनी रिजर्व बैंक से अधिकृत कंपनी क्लियरिंग काॅर्पोरेशन आॅफ इंडिया लि. की सब्सिडियरी है) को मान्यता मिली है। बोर्ड के अलावा एक कमेटी भी है जो फाउंडेशन का संचालन करती है। बोर्ड में भारत सहित अन्य सदस्य देशों के दक्ष प्रतिनिधियों को शामिल किया जाता है। जीएल ईआईएफ का मुख्यालय स्विट्ज़रलैंड के बासल शहर में स्थित है। एलईआई कोड नंबर एक वर्ष के लिए वैध होता है। प्रत्येक वर्ष इसे सशुल्क रिन्यू कराया जा सकता है।

    अब तक के आकड़े खंगालने पर यह समझ में आता है कि अमनपसंद, उन्नत और विकास में प्रयासरत देशों में एलईआई प्रणाली काफी लोकप्रिय हुई या हो रही है। जबकि अशांत और अपराध बाहुल्य देशों में एलईआई को नहीं के बराबर महत्व दिया जा रहा है। इसका अर्थ यह कि उन देशों को वित्तीय लेनदेन में पारदर्शिता लाने में रुचि नहीं अथवा वहां इसकी उपयोगिता नहीं, या फिर सामाजिक राजनैतिक स्थितियां इसकी अनुमति नहीं देतीं।

    विश्व में इस समय 17.44 लाख से अधिक सक्रिय एलईआई हैं। नन्हे से फिनलैंड में 33959, नाॅर्वे में 35688, जर्मनी में 1.40 लाख, इटली में 1.29 लाख, यूके में 1.53 लाख, कनाडा में 35277, भारत में 47996, चीन में 39302 और सबसे ज्यादा अमेरिका में 2.25 लाख से अधिक एलईआई सक्रिय हैं। जबकि अफगानिस्तान में 7, ईरान में 6, नेपाल में 28 व पाकिस्तान में 60 एलईआई सक्रिय हैं। जीएलईआईएफ ने एलईआई की फीस से कलेंडर वर्ष 2019 में करीब 125 करोड़ रु का राजस्व प्राप्त किया। इसी से अपने कर्मियों के वेतन भत्तों पर लगभग 32 करोड़ रु व्यय किए और अन्य मदों पर खर्च निकालने के बाद 58 करोड़ रु बचाए।

      प्रणतेश नारायण बाजपेयी

Saturday, 6 March 2021

यूपी का गुड़ दुनिया में बनाएगा अलग पहचान

      लखनऊ। आज से 4 साल पहले गन्ना किसानों की स्थिति खराब थी। पाँच,छह, सात वर्षों तक गन्ना भुगतान नहीं होता था। खांडसारी उद्योग को पूरी तरह बंद कर दिया गया था। लाइसेंस नहीं मिल पाते थे। हमने सत्ता में आते ही स्थिति बदली। आज आवेदन करने के कुछ ही घंटों के अंदर उसको लाइसेंस भी मिलता है। लाइसेंस शुल्क माफ है। ऑनलाइन व्यवस्था कर दी गई है। 15 किलोमीटर की बजाय 7 किलोमीटर के दायरे में कोई भी खांडसारी उद्योग लग सकता है। उसका परिणाम है कि उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर,शामली हो अयोध्या, लखीमपुर खीरी, शाहजहांपुर जैसे गन्ना बाहुल्य जनपद हैं, वहां के किसानों के द्वारा जो गन्ना पैदा किया जाता है, उससे बनने वाला गुड़ न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि देश और दुनिया के स्तर पर भी उनको एक नई पहचान और नया लाभकारी मूल्य दिला रहा है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को लखनऊ स्थित इन्दिरा गांधी प्रतिष्ठान में राज्य के गन्ना विकास विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय 'राज्य गुड़ महोत्सव 2021' का शुभारम्भ किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि मुझे प्रसन्नता है की प्रदेश के साठ लाख किसानों के जीवन में परिवर्तन लाने के उद्देश्य से राज्य सरकार के प्रयासों से आज राज्य गुड महोत्सव एक नई ऊंचाइयों को छूता हुआ दिखाई दे रहा है। स्थानीय उत्पाद को मार्केट मिले उसकी ब्रांडिंग हो सके और वह देश और दुनिया में उत्पाद जाकर के किसान को अधिक से अधिक लाभकारी मूल्य दे सकें, इस उद्देश्य से यह कार्यक्रम प्रारंभ हुए हैं। मैं इस कार्यक्रम के लिए प्रदेश के गन्ना मंत्री को, अपर मुख्य सचिव गन्ना और आबकारी को और उनकी पूरी टीम को हृदय से एक सफल आयोजन के लिए बधाई देता हूं। मैंने कई पंडालों का निरीक्षण किया है। एक नई रुचि जागृत हुई है। स्वास्थ्य के प्रति स्वच्छता के प्रति भी, स्वच्छता के प्रति भी जो एक नई जागरूकता है नए भारत की नई सोंच है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने देश को स्वच्छ भारत मिशन के माध्यम से जो एक नई सोंच स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता दी है वो हमेशा हर जगह कारगर रहेगी।  


सीएम ने बताया हमारे बचपन में चीनी का दाम ज्यादा और गुड़ का दाम कम हुआ करता था। आज अपने औषधीय गुणों के कारण गुड़ का दाम चीनी की अपेक्षा बढ़ा है। प्रदेश में सात लाख गन्ना किसान हैं, 27 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती होती है।  नई व्यवस्था से उन गन्ना किसानों को जोड़ना उनके लिए ऑनलाइन पर्ची की व्यवस्था करने का कार्य हमने किया है। 125600 करोड़ से अधिक गन्ना मूल्यों का भुगतान किया है। कोरोना काल में जब अन्य राज्यों में चीनी मिलें बंद हुईं तो हमने राज्य की चीनी मिलें चलाई। जब तक गन्ने की एक भी फसल खड़ी है तब तक कोई चीनी मिल बंद नहीं होनी चाहिए हमने ऐसा प्रबंध किया। अभी तक 53% से अधिक गन्ना मूल्यों का भुगतान किया जा चुका है। गुड़ प्रदेश के अंदर नया ब्रांड बन रहा है। हमने प्रदेश के तीन जनपदों मुजफ्फरनगर, अयोध्या लखीमपुर में ओडीओपी के रूप में गुड़ को शामिल किया है। मुझे विश्वास है कि प्रोडक्ट आप सबके इन उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का काम करेगा और गन्ना किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने में भी सहायक होगा। 


गौरतलब है कि आजादी के बाद पहली बार गुड़ महोत्सव का आयोजन हो रहा है। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य गुड़ उत्पादक किसानों को गुणवत्तायुक्त गुड़ उत्पादन और उसके सह-उत्पाद निर्माण हेतु प्रोत्साहित करना और गुड़ के औषधीय गुणों के प्रति आम जन मानस को जागरूक करना है। अपने आप में इस अनूठे महोत्सव में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आये गुड़ उत्पादकों द्वारा गुड़ एवं इसके सह-उत्पादों के विभिन्न स्टॅाल्स लगाए गए हैं। इन स्टॉलों पर गुड़ से बनी चाय, गुड़ से बने लड्डू, कुल्फी, जलेबी, हलवा, खीर, सोंठ, सौंफ, इलायची, तिल, मूंगफली,गजक,काजू, बादाम, केसर युक्त गुड़ एवं गुड़ के गुलगुले, गुड़ की ही चॉकलेट आदि अनेक उत्पादों और व्यंजनों का लोग जमकर लुत्फ उठा रहे हैं।

Monday, 18 March 2019

प्रियंका गांधी का तंज, गरीब चौकीदार नहीं रखते

   कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान पर तंज कसते हुए कहा है कि गरीब नहीं बल्कि अमीर लोग चौकीदार रखते हैं। 

  खबर है कि उन्होंने यह बात उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में स्थानीय लोगों के साथ बातचीत करते हुए कही। खबर है कि इसके साथ ही प्रियंका गांधी ने यह भी कहा, ‘आज देश का संविधान खतरे में है. लोगों की आवाज दबाई जा रही है। 
  मौजूदा सरकार चुनिंदा लोगों के लिए काम रही है। इन्हीं सब वजहों से मुझे घर से बाहर निकलना पड़ा है। खबर है कि इस मौके पर प्रियंका गांधी ने देश को बचाने के लिए लोगों से कांग्रेस का समर्थन करने की अपील भी की है।
   विशेषज्ञों की मानें तो इससे पहले इसी रविवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी प्रधानमंत्री के इस अभियान पर निशाना साधा था। तब उन्होंने कहा था कि सच को बदला नहीं जा सकता। 
  विशेषज्ञों की मानें तो राहुल गांधी का कहना था, ‘आज हर कोई कह रहा है कि चौकीदार चोर है.’ रफाल विमान सौदे में कथित अनियमितता का दावा करते हुए बीते साल से ही राहुल गांधी नरेंद्र मोदी के लिए इस जुमले इस्तेमाल करते आए हैं।
   विशेषज्ञों की मानें तो कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा है कि नरेंद्र मोदी की चोरी पकड़े जाने के बाद उन्होंने पूरे देश को ही चौकीदार में तब्दील कर दिया है।

Sunday, 17 March 2019

चीन को क्यों चुभते हैं दलाई लामा ?

  तिब्बतियों के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को निर्वासन में रहते हुए 60 साल हो गए हैं, लेकिन अब भी वह तिब्बत में रहने वाले अपने अनुयायियों के दिल में बसते हैं। 

   खबर है कि यही बात चीनी अधिकारियों को परेशान करती है। चीन के तिब्बती पहाड़ी इलाके के उत्तरी छोर पर स्थित है टक्टसर जहां पर 1935 में एक किसान परिवार में दलाई लामा का जन्म हुआ था। 
  खबर है कि यह जगह ना सिर्फ दलाई लामा को मानने वालों को अपनी तरफ खींचती है बल्कि विदेशी पर्यटक भी यहां बड़ी संख्या में आते हैं। ऐसे में, यहां कड़ी सुरक्षा भी होती है।
   खबर है कि हाल में पत्रकारों ने टक्टसर का दौरा किया जिसे चीनी भाषा में होंग्या के नाम से जाना जाता है। वहां सशस्त्र पुलिसवालों ने पत्रकारों को उस रास्ते की तरफ नहीं जाने दिया जो एक गांव की तरफ जाता है। वहां पर लगभग 60 घर हैं।
   खबर है कि सुरक्षाकर्मियों और सफेद कपड़े पहने हुए दर्जनों अधिकारियों ने यह कहते हुए पत्रकारों को वहां जाने से रोक दिया कि यह निजी संपत्ति है और जनता के लिए खुली नहीं है।
   खबर है कि जब इस बारे में छिंगहाई की प्रांतीय सरकार और चीन के स्टेट काउंसिल इंफर्मेशन कार्यालय से पूछा गया तो उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया। माना जाता है कि इस गांव में अब भी दलाई लामा का परिवार रहता है, उन्हें लकड़ी के दरवाजों और कंक्रीट की बड़ी दीवारों के पीछे रखा गया है।
   खबर है कि जब भी किसी संवेदनशील राजनीतिक घटना की वर्षगांठ होती है तो चीनी अधिकारी इस गांव में बाहरी लोगों को जाने से रोक देते हैं।
   विशेषज्ञों की मानें तो चीन नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा को एक खतरनाक अलगाववादी मानता है और वह 83 वर्षीय इस धार्मिक नेता को "साधु के वेश में एक भेड़िया" करार देता है। दूसरी तरफ, दलाई लामा किसी भी तरह की हिंसा भड़काने के आरोपों को खारिज करते हैं। खबर है कि उनका कहना है कि वह बस तिब्बत के लिए वास्तविक स्वायत्तता चाहते हैं।
   विशेषज्ञों की मानें तो चीन में रहने वाले 60 लाख से ज्यादा तिब्बतियों में ज्यादातर अब भी दलाई लामा का बहुत सम्मान करते हैं। हालांकि चीन में दलाई लामा की तस्वीर और उनके प्रति सम्मान के सार्वजनिक प्रदर्शन पर प्रतिबंध है। 1959 में दलाई लामा को एक सैनिक के वेश में तिब्बत से भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी थी।
   विशेषज्ञों की मानें तो उस वक्त अफवाह उड़ी थी कि चीनी सैनिक उनके अपहरण या हत्या की योजना बना रहे हैं। इससे तिब्बत में बगावत शुरू हो गई, लेकिन चीन ने जल्द ही उसे दबा दिया और दलाई लामा को तिब्बत छोड़ना पड़ा। तब से वे कभी तिब्बत वापस नहीं जा सके हैं।
   विशेषज्ञों की मानें तो दलाई लामा का नाम पहले ल्हामो थोंडुप था। वह सिर्फ दो साल के थे जब उन्हें तिब्बतियों के सबसे अहम अध्यात्मिक नेता दलाई लामा का नया अवतार घोषित किया गया। इस तरह उन्हें ल्हासा में रहने वाले अपने परिवार से अलग कर दिया गया।
   विशेषज्ञों की मानें तो दलाई लामा के चीन से भागने की वर्षगांठ चीन के सियासी कैलेंडर की सबसे संवेदशील तारीखों में से एक होती है। एक ऐसी ही तारीख है 1989 में बीजिंग के थिएनानमन चौक पर लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों को कुचलना. इस घटना को इस साल जून में 30 वर्ष पूरे हो रहे हैं। खबर है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी नहीं चाहेगी कि इसे लेकर किसी तरह का विवाद हो।
   खबर है कि चीनी संसद के हालिया सत्र के दौरान तिब्बत के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख वु इंगची ने कहा कि तिब्बत के लोग दलाई लामा से ज्यादा लगाव चीन की सरकार से रखते हैं। उनके मुताबिक, "दलाई लामा ने तिब्बत के लोगों के लिए एक भी अच्छी चीज नहीं की है."।
   विशेषज्ञों की मानें तो दलाई लामा की उम्र बढ़ रही है। ऐसे में, बहुत से तिब्बतियों को डर है कि चीन की सरकार उनकी जगह अपने किसी पसंदीदा व्यक्ति को नियुक्त कर देगी। दलाई लामा ने कहा कि उनके अवतार को चीन नियंत्रित इलाके के बाहर से ढूंढा जा सकता है। या फिर दलाई लामा नाम की संस्था उनके साथ ही खत्म हो सकती है।

सीमेंट की ईंट बनाने का करें बिजनेस, लाखों कमाएं

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